भारतीय समाज में वटसावित्री व्रत को एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है, जहाँ महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए बरगद के पेड़ (वटवृक्ष) की पूजा करती हैं और उपवास रखती हैं। लेकिन जब हम इस प्रथा को आधुनिक भारत के निर्माता, समाज सुधारक और नारी मुक्ति के प्रबल समर्थक डॉ. बी.आर. आंबेडकर (बाबासाहेब) के विचारों के चश्मे से देखते हैं, तो एक गहरा सामाजिक और वैचारिक दृष्टिकोण सामने आता है।
आइए समझते हैं कि वटसावित्री जैसी पारंपरिक प्रथाओं और हिंदू समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर बाबासाहेब का दृष्टिकोण क्या था:
१. ‘मनुस्मृति’ और पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विरोध
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर मनुस्मृति का कड़ा अध्ययन और विरोध किया था। उनका मानना था कि इन ग्रंथों ने महिलाओं को पुरुषों के अधीन बना दिया और उनकी स्वतंत्रता को पूरी तरह से छीन लिया।
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एकतरफा समर्पण: वटसावित्री जैसी प्रथाओं में सारा दायित्व महिलाओं पर डाल दिया जाता है—पति की लंबी उम्र, उसका स्वास्थ्य और उसका भाग्य स्त्री के उपवास और पूजा पर निर्भर बताया जाता है।
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समानता का अभाव: बाबासाहेब का सवाल था कि यदि विवाह एक समान साझेदारी है, तो केवल स्त्रियों को ही पुरुषों की लंबी आयु के लिए ऐसे कठिन व्रत करने के लिए क्यों बाध्य किया जाता है? पुरुषों के लिए स्त्रियों की लंबी उम्र के लिए ऐसा कोई व्रत क्यों नहीं है?
२. अंधविश्वास और रूढ़िवादिता के खिलाफ संघर्ष
बाबासाहेब तर्कवाद (Rationalism) और विज्ञान के कट्टर समर्थक थे। वे ऐसी किसी भी प्रथा के खिलाफ थे जो इंसान को अंधविश्वास की ओर ले जाए।
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यमराज से सावित्री द्वारा सत्यवान के प्राण वापस लाने की पौराणिक कथा को वे प्रतीकात्मक रूप से तो देख सकते थे, लेकिन इसे जीवन का कड़वा सच मानकर महिलाओं को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के वे खिलाफ थे।
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उनका मानना था कि महिलाओं को काल्पनिक कथाओं और व्रतों में उलझाकर रखने से उनका ध्यान वास्तविक मुद्दों जैसे—शिक्षा, स्वास्थ्य और अपने अधिकारों से भटक जाता है।
३. ‘हिंदू कोड बिल’ और महिलाओं के वास्तविक अधिकार
बाबासाहेब केवल आलोचना नहीं करते थे, बल्कि उन्होंने महिलाओं को वास्तविक शक्ति देने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। जब वे देश के पहले कानून मंत्री बने, तो उन्होंने ‘हिंदू कोड बिल’ पेश किया।
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इस बिल का उद्देश्य महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देना, तलाक का अधिकार देना और बहुविवाह प्रथा को समाप्त करना था।
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दिलचस्प बात यह है कि उस समय कई रूढ़िवादी संगठनों और नेताओं ने यह कहकर इस बिल का विरोध किया था कि यह “पति-पत्नी के पवित्र और जन्म-जन्मांतर के रिश्ते (जैसा कि सावित्री-सत्यवान की कथा में दिखाया गया है) को तोड़ देगा।”
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बाबासाहेब का स्पष्ट मानना था कि महिलाओं को ‘सात जन्मों के साथ’ के भावनात्मक जाल में बांधकर उनके इस जन्म के मानवीय अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
४. महिलाओं के प्रति बाबासाहेब का आह्वान
२५ दिसंबर १९२७ को महाड सत्याग्रह के दौरान और बाद में महिलाओं की विभिन्न सभाओं में बाबासाहेब ने महिलाओं से सीधा संवाद किया था। उन्होंने कहा था:
“तुम्हारे माथे पर जो गुलामी के चिह्न हैं, उन्हें मिटा दो। रूढ़िवादी और पुरानी सड़ी-गली परंपराओं को छोड़ो जो तुम्हें पुरुषों से कमतर आंकती हैं।”
वे चाहते थे कि महिलाएँ केवल घर की चहारदीवारी और धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित न रहें, बल्कि शिक्षित होकर समाज के निर्माण में बराबरी का हिस्सा लें। उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया था: “मैं किसी समुदाय की प्रगति का आकलन उस समुदाय की महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति से करता हूँ।”
निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का वटसावित्री या किसी भी पारंपरिक व्रत के प्रति दृष्टिकोण व्यक्तिगत विरोध का नहीं, बल्कि वैचारिक और सामाजिक मुक्ति का था। वे चाहते थे कि महिलाएँ खुद को केवल ‘पति की सेवा और उसकी लंबी उम्र की मन्नत मांगने वाली’ वस्तु न समझें, बल्कि एक स्वतंत्र, आत्मसम्मान से जीने वाली नागरिक के रूप में अपनी पहचान बनाएं।
आज के आधुनिक युग में यदि हम बाबासाहेब के विचारों को अपनाना चाहते हैं, तो महिलाओं को केवल व्रतों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने का समान अधिकार देना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।

