जंतर-मंतर से अस्पताल तक: क्या है पूरा मामला?

प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक, इंजीनियर और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को लंबे समय तक चले अनिश्चितकालीन अनशन के बाद दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए पुलिस और चिकित्सा टीम उन्हें जंतर-मंतर स्थित प्रदर्शन स्थल से अस्पताल ले गई। इस घटनाक्रम के बाद आंदोलन को लेकर देशभर में […]

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‘संसद चलो’ मार्च की तैयारी: आंदोलन, मांगें और आगे की राह

देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों “संसद चलो” मार्च को लेकर चर्चा तेज है। विभिन्न सामाजिक और छात्र संगठनों द्वारा संसद की ओर मार्च निकालने की घोषणा के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस शुरू हो गई है। यह मार्च युवाओं, छात्रों और आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने

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अण्णाभाऊ साठे, फुले, शाहू और आंबेडकर के विचार आज कितने प्रासंगिक हैं?

भारत के सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के इतिहास में महात्मा ज्योतिराव फुले, राजर्षि शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे का योगदान अतुलनीय है। इन चारों महान व्यक्तित्वों ने अपने विचारों और संघर्षों के माध्यम से समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों को नई दिशा दी। उन्होंने ऐसे भारत

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अण्णाभाऊ साठे और सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन

भारतीय समाज और साहित्य के इतिहास में लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे का नाम सामाजिक परिवर्तन के महान योद्धाओं में लिया जाता है। वे केवल एक लेखक, कवि और लोकशाहीर नहीं थे, बल्कि समाज के वंचित, शोषित, दलित, मजदूर और गरीब वर्ग की आवाज भी थे। उन्होंने अपने साहित्य, लोककला और जनआंदोलनों के माध्यम से सामाजिक न्याय,

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अण्णाभाऊ साठे का साहित्यिक योगदान

भारतीय साहित्य और समाज सुधार के इतिहास में लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के वंचित, शोषित, दलित, मजदूर और मेहनतकश वर्ग की पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दी। अण्णाभाऊ साठे केवल एक साहित्यकार नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक परिवर्तन के

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अण्णाभाऊ साठे : लोकशाहीर का प्रेरणादायक जीवनचरित्र

भारत के सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास में अण्णाभाऊ साठे का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल एक महान साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि समाज के वंचित, शोषित और मेहनतकश वर्ग की आवाज भी थे। अपनी लेखनी, लोकशाहीरी और सामाजिक कार्यों के माध्यम से उन्होंने समाज में जागरूकता और परिवर्तन की

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भारतीय समाज सुधार में महात्मा ज्योतिराव फुले का योगदान

महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले भारत के महान समाज सुधारकों, शिक्षाविदों और सामाजिक क्रांतिकारियों में अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने अपने जीवन को समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव, छुआछूत, महिला उत्पीड़न, अंधविश्वास और सामाजिक असमानता के खिलाफ संघर्ष के लिए समर्पित कर दिया। उनके कार्यों ने भारतीय समाज में शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की नई

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सत्यशोधक समाज की स्थापना और उद्देश्य

भारतीय समाज सुधार के इतिहास में सत्यशोधक समाज एक क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन के रूप में जाना जाता है। इसकी स्थापना महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले ने 24 सितंबर 1873 को पुणे में की थी। इस संगठन का उद्देश्य समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, छुआछूत, अंधविश्वास और सामाजिक शोषण के खिलाफ संघर्ष करना तथा समानता,

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सावित्री-सत्यवान कथा: स्त्री के त्याग का गौरवगान या समानता का प्रश्न?

भारतीय संस्कृति में पति की लंबी आयु और सौभाग्य के लिए ‘वटसावित्री व्रत’ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस व्रत के केंद्र में सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा है। यमराज के पाश से अपनी बुद्धि और निष्ठा के बल पर पति के प्राण वापस लाने वाली सावित्री भारतीय परंपरा में ‘आदर्श पत्नी’ का सर्वोच्च

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वटसावित्री व्रत और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का दृष्टिकोण: रूढ़िवादिता बनाम स्त्री मुक्ति

भारतीय समाज में वटसावित्री व्रत को एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है, जहाँ महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए बरगद के पेड़ (वटवृक्ष) की पूजा करती हैं और उपवास रखती हैं। लेकिन जब हम इस प्रथा को आधुनिक भारत के निर्माता, समाज सुधारक और नारी मुक्ति के प्रबल

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