जैसा बीज वैसा फल

जो व्यक्ति सम्यक संबुद्ध बना, अरहंत बना, वीतराग, वीतद्वेष, वीतमोह, भवमुक्त बना । उसके जीवन की चार महत्त्वपूर्ण घटनाएं -वह बोधिसत्त्व के रूप में राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के नाम से शाक्यों के घर में जन्मा। राजकुमार है, पर किसी राजमहल में नहीं जन्मा। जन्मा किसी पेड़ के तले, खुली प्रकृति में, खुले आसमान के तले …

जैसा बीज वैसा फल Read More »

भगवान बुद्ध ने धर्म सिखाया, बौद्धधर्म नहीं!

लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व जब मैं अमेरिका में धर्म सिखाने के लिए गया तब किसी ने मेरा इंटरव्यू लिया और पूछा कि मैंने अब तक कितने लोगों को बौद्ध बनाया हैं ? मैंने उत्तर दिया — एक को भी नहीं । इस पर पूछा गया — क्या आप बौद्धधर्म नहीं सिखाते ? –बिल्कुल नहीं । …

भगवान बुद्ध ने धर्म सिखाया, बौद्धधर्म नहीं! Read More »

शील की परिशुद्धता

शील, समाधि, प्रज्ञा; शील, समाधि, प्रज्ञा – इसमें सारा धर्म समा गया। धर्म की परिभाषा पूर्णतः समा गयी। धर्म की परिशुद्धता समा गयी। शील का पालन करें याने सदाचार का जीवन जीयें और सदाचार का जीवन जीने के लिए समाधि का अभ्यास करें याने मन के मालिक बन जाने का अभ्यास करें। और इतना ही …

शील की परिशुद्धता Read More »

आर्ये अष्टांगिक मार्ग सुत्त

एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के बनाये आराम जेतवन में विहार करते थे l वहाँ भगवान ने भिक्षुओ को आमंत्रित किया , भिक्षुओ ! आर्ये अष्टांगिक मार्ग का विभाग कर उपदेश करुँगा l उसे सुनो… भदन्त ! कह कर उन भिक्षुओ ने भगवान का उत्तर दिया। भगवान बोले, भिक्षुओ आर्ये अष्टांगिक मार्ग क्या हैं …

आर्ये अष्टांगिक मार्ग सुत्त Read More »

पगोडाः कृतज्ञता का प्रतीक

म्यंमा के दो श्रद्धालु व्यापारी जब भगवान बुद्ध की केशधातु लेकर अपने देश लौटे तब वहां के लोगों ने श्रद्धापूर्वक इस केशधातु को श्वेडगोन पहाड़ी पर सन्निधानित कर एक पगोडा बनाया। उसके साथ-साथ शहर में सूले पगोडा बना और तट पर बोटठाऊ पगोडा बना। उस समय हो सकता है कि किसी सिरफिरे अदूरदर्शी ने इन …

पगोडाः कृतज्ञता का प्रतीक Read More »

सद्धर्म की शुद्धता 

भारत में भगवान बुद्ध का सद्धर्म क्यों और कैसे लुप्त हुआ, इसे समझने के लिए दो हजार वर्ष पूर्व के इतिहास का निरीक्षण करना होगा। उस समय तक भिक्षुओं में सेक्ख भी थे और असेक्ख भी। सेक्ख माने वह जो अभी सीख रहा है। असेक्ख माने वह जो अरहंत हो गया। यानी जिसे सीखने के …

सद्धर्म की शुद्धता  Read More »

सद्धर्म की शुद्धता

भारत में भगवान बुद्ध का सद्धर्म क्यों और कैसे लुप्त हुआ, इसे समझने के लिए दो हजार वर्ष पूर्व के इतिहास का निरीक्षण करना होगा। उस समय तक भिक्षुओं में सेक्ख भी थे और असेक्ख भी। सेक्ख माने वह जो अभी सीख रहा है। असेक्ख माने वह जो अरहंत हो गया। यानी जिसे सीखने के …

सद्धर्म की शुद्धता Read More »

विपश्यना शिविर – प्रवचनों में प्रयुक्त पालि-पद

“नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स!” – नमस्कार है उन अर्हत सम्यक सम्बुद्ध को! “ये च बुद्धा अतीता च, ये च बुद्धा अनागता। पच्चुप्पना च ये बुद्धा, अहं वन्दामि सब्बदा ॥” – जितने भी बुद्ध हुए हैं अतीत काल में, जितने भी बुद्ध होंगे आने वाले काल में, जितने भी बुद्ध हैं वर्तमान काल में, उन …

विपश्यना शिविर – प्रवचनों में प्रयुक्त पालि-पद Read More »

तथागत बुद्ध ने कहा – इस संसार मे चार प्रकार के लोग हैं ।

(1) अंधकार से अंधकार की ओर जानेवाले ………. ऐसा व्यक्ति जिसके जीवन में अंधकार हैं , अविद्या हैं, बुरे कर्म करता हैं। अकुशल कर्म करता हैं, बेहोशी में जीवन नष्ट करता हैं । ऐसा व्यक्ति आज तो दुखी हैं ही, लेकिन आगे के लिये भी दुःख के बीज बोता हैं। (2) अंधकार से प्रकाश की …

तथागत बुद्ध ने कहा – इस संसार मे चार प्रकार के लोग हैं । Read More »

मन का स्वभाव कैसे बदलें?

सारे कर्मों को सुधारने के लिए मन के कर्मों को सुधारना होता है और मन के कर्म को सुधारने के लिए मन पर पहरा लगाना होता है। कैसे कोई पहरा लगाएगा जब यह ही नहीं जानता कि मन क्या है और कैसे काम करता है ? उसका शरीर से क्या संबंध है ? वह शरीर …

मन का स्वभाव कैसे बदलें? Read More »