मन बंधन का मूल

मन बंधन का मूल है, मन ही मुक्ति उपाय।
विकृत मन जकड़ा रहे, निर्विकार खुल जाय ॥
मन के भीतर ही छिपी, स्वर्ग सुखों की खान ।
मन के भीतर धधकती, ज्वाला नरक समान ॥
कुदरत का कानून है, सब पर लागू होय ।
मैले मन व्याकुल रहे, निर्मल सुखिया होय ॥
अपने मन का मैल ही, अपना नाश कराय।
ज्यूं लोहे का जंग ही, लोहे को खा जाय ॥
मन के कर्म सुधार ले, मन ही प्रमुख प्रधान ।
कायिक वाचिक कर्म तो, मन की ही संतान ॥
कुदरत लेवे पक्ष ना, करे न कभी लिहाज।
उसको वैसा फल मिले, जिसका जैसा काज ॥
कर्म हमारा ईश है, कर्म जगत का ईश।
सुख-दुख देता कर्म ही, अन्य कौन जगदीश?
कर्म हमारी माय है, कर्म हमारा बाप।
अपने-अपने कर्म जनमें अपने आप॥
संवर कर नव कर्म पर, पूर्व कर्म धुल जायें।
दुख बंधन से मुक्ति का, कैसा सरल उपाय ॥
तृष्णासागर में पड़ा, जीव डुबकियां खाय।
ओर छोर दीखे नहीं, द्वीप नजर ना आय॥
तृष्णा पूरी कर सकू, ऐसा नहीं उपाय।
बिन पैदे की बालटी, कभी भरी ना जाय ॥
यह निसर्ग का नियम है, सब पर लागू होय।
विषयों में सुख खोजते, मन व्याकुल ही होय॥
तृष्णा जड़ से खोद कर, अनासक्त बन जाय।
भव सागर से तरन का, यह ही एक उपाय।
राग द्वेष की, मोह की, जब तक मन में खान ।
तब तक दुख ही दुक्ख है, दूर मुक्ति निर्वाण ॥
समझे दुख के मूल को, करे मूल पर वार ।
तो निरोध हो दुःख का, खुले मुक्ति के द्वार ॥
दुक्ख जनम है, दुख जरा, दुक्ख मरण दुख रोग।
प्रिय-वियोग का दुख बहुत, दुख अप्रिय संयोग।
जब तक चित्त विकार है, बना हुआ मैं दास ।
तब तक चर्चा मुक्ति की, कोरा बुद्धिविलास ॥
मैल मैल सब कोइ कहे, मैल न समझे कोय।
राग द्वेष और मोह ही, मैल चित्त का होय ॥
अपने चित्त विकार के, कैदी हैं सब लोग।
अपने कारागार में, भोग रहे दुख भोग ॥
मन जैसा बैरी नहीं, मन जैसा ना मीत ।
मैला मन बंदी रहे, होवे मुक्त पुनीत ॥
मैला मन एकाग्र कर, शोध सके तो शोध ।
मैले मन दुखिया रहें, विकल, अशांत, अबोध ॥
ताले कारावास के, समय पाय खुल जायें।
मन के ताले खुलन का, दिखे न सहज उपाय ।।
मन के ताले खुलन की, कुंजी मिली अमोल ।
जब मन बँधे विकार में, तब उसको दे खोल ॥
तालों पर ताले लगे, कैसा कारागार।
बंधन पर बंधन बँधे, जब मन जगे विकार ॥
सब निज परिजन सम लगें, बैरी हों या मीत ।
सबके प्रति मैत्री जगे, यही प्रीत की रीत ॥
दुखियारों को देख कर, करुणा जगे अपार ।
मन अनुकंपा से भरे, तो ही ब्रह्मविहार ॥
सुखियारों को देख कर, जागे मोद अपार ।
जगे न ईर्ष्या रंच भर, तो ही ब्रह्मविहार ॥
प्रिय अप्रिय संयोग से, चित विचलित ना होय।
समता ब्रह्मविहार की, सतत बलवती होय ॥
देष द्रोह सारे मिटे, जगे चित्त में प्रीत।
मैत्री करुणा प्यार की, गंगा बहे पुनीत ॥
✍ श्री सत्य नारायण गोयनका
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पुस्तक: मंगल हुआ प्रभात ।
विपश्यना विशोधन विन्यास ।।
भवतु सब्ब मगंलं !!
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