विपश्यना और कोरोना

प्रश्न: कोरोना महामारी के समय में भय का सामना कैसे करें? धम्म महावना विपश्यना सेंटर, कैलिफोर्निया के टीचर श्री जाॅन बिअरी जी का
उत्तर …
John Beary: एक वायरस संक्रामक हो सकता है l उसी तरह आपका भय भी संक्रामक है l हम वायरस के संक्रमण के माध्यम तो हो सकते हैं, पर भय फैलाने का माध्यम हमें नहीं बनना चाहिए l
इस विपरीत समय मे, सभी विपस्सी योगी अपने भय का अवरोध करके, भय और व्याकुलता का माध्यम ना बनते हुए, अपने आसपास के लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं l
सोशल मीडिया/न्यूज चैनल्स डर को निरंतर बढावा दे रहे हैं l भविष्य के अंधकारमय, डरावने चित्र प्रस्तुत किए जाते हैं जिससे बाहर और भीतर सब कुछ धुंधला और अस्पष्ट लगता है l इसके कारण हमारी सही तरह से सोचने समझने की शक्ति मे बाधा उत्पन्न होती है और हम सही निर्णय नहीं ले पाते l हम अपने आप को सुरक्षित रखने मे असहाय महसूस करते हैंI परिणाम स्वरुप, हमारे आंतरिक भय और असुरक्षा को और बढावा मिलता है l
विपश्यना साधना करने के दौरान हमको ये अवसर मिलता है कि हम अपने भय का सामना कर सके, उसकी शक्ति को जीर्ण कर सके, और अंत मे उसका पूर्ण रूप से निरोध/निर्झरित कर सके l पर ये तभी सम्भव है जब हम विपश्यना साधना करे – जब भी भय का उदय हुआ हम सम्पजञ्ञ (sampajañña) में स्थापित रहे l
इसको ऐसे समझे की साधना करते समय, विचारों और भावनाओं के माध्यम से जब भी चिंता, भय, व्याकुलता, आदि विकार उत्पन्न होता है तब ये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि हम उस क्षण से जुड़ी सम्वेदनाओं के प्रति सजग रहे और साथ ही अनित्य का बोध बनाए रखे l
जितना अधिक हम इसे करने मे समर्थ होंगे, उतना हम अपने मन के प्रतिक्रिया करने वाले स्वभाव को – जिसके कारण मन निरंतर व्यर्थ की कल्पनाओं मे उलझा रहता है और केवल दुख और संताप ही उत्पन्न करता है और कुछ नहीं – ऐसे स्वभाव को परिवर्तित कर पाएंगे l
कोई भी महामारी हो, या फिर वैश्विक महामारी उसके कारण हमें इन मूलभूतों से भटकना नहीं चाहिए l मनुष्य प्राणी होने के नाते हमें अपने पूरे जीवन काल मे अच्छे और बुरे स्वास्थ्य, निरोग और बीमारी जैसी परिस्थितियों से निरंतर गुज़रते रहते हैं जब तक हमारी मृत्यु नहीं हो जाती l अविद्या के प्रभाव से हम इन चरणों की अतियो मे चले जाते हैं – युवावस्था मे हम उत्साहित रहते हैं, बड़े बड़े से बड़ा जोखिम भी उठाने को तैयार रहते हैं, मानो की हम जैसे अविनाशी है l
जब हम वयस्क अवस्था में आते हैं तो किसी बीमारी के आने पर अत्याधिक प्रतिक्रिया (overreact) करते है, जैसे की हमारा रोग किसी तरह अनोखा है और अनंतकाल तक रहने वाला है l “हाय रे, ये तो जरूर ही कैंसर है” “हाय रे, मुझे तो जरूर ही कोरोना हो गया है” ये दोनों अतियां इस बात की सूचक है कि हममे अनित्यता के सत्य के प्रति सजगता और जागरूकता दोनों की कमी है l आपने भीतर, जड़ों मे घर कर चुकी अविद्या और उसके प्रभाव को दूर करने का एक मात्र उपाय धम्म साधना ही है l
हम समय के एक बिन्दु मे रोग ग्रसित होंगे ही और हम उससे निकल कर स्वस्थ भी हो जाएंगे l ये प्रक्रिया तभी ही समाप्त होगी जब हम पुनः स्वस्थ होने के योग्य ही ना हो l अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित एहतियात(precautions), परिभाषा से ही, वही होते होते है जो एक संतुलित मन से ही लिए जाते है l हम एक सुचित/संतुलित मन शीघ्रता से प्राप्त कर सकते हैं जब हम विपश्यना/सम्पजञ्ञ के माध्यम से अपने मन के विकारों को दूर करने का काम शुरु कर दे l
मेत्ता

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