आर्ये अष्टांगिक मार्ग सुत्त

एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के बनाये आराम जेतवन में विहार करते थे l
वहाँ भगवान ने भिक्षुओ को आमंत्रित किया ,
भिक्षुओ ! आर्ये अष्टांगिक मार्ग का विभाग कर उपदेश करुँगा l उसे सुनो…
भदन्त ! कह कर उन भिक्षुओ ने भगवान का उत्तर दिया।
भगवान बोले, भिक्षुओ आर्ये अष्टांगिक मार्ग क्या हैं ? यही जो सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प , सम्यक वचन , सम्यक कर्मान्त , सम्यक आजीव , सम्यक व्ययाम , सम्यक स्मृति , सम्यक समाधी।
भिक्षुओ सम्यक दृष्टि क्या हैं ?
भिक्षुओ ! दुःख का ज्ञान, दुःख के समुदय का ज्ञान, दुःख के निरोध का ज्ञान, दुःख के निरोध गामी मार्ग का ज्ञान,यही सम्यक दृष्टि कही जाती हैं।
भिक्षुओ सम्यक संकल्प क्या हैं ?
भिक्षुओ ! जो त्याग का संकल्प तथा वैर और हिंसा से विरत रहने का संकल्प हैं यही सम्यक संकल्प कहा जाता हैं।
भिक्षुओ सम्यक वचन क्या हैं ?
भिक्षुओ ! जो झूठ, चुगली, कटु-भाषण और गप्प हाँकने से विरत रहना है यही सम्यक वचन कहा जाता हैं।
भिक्षुओ सम्यक कर्मान्त क्या हैं ?
भिक्षुओ ! जो जीव हिंसा ,चोरी और अब्रह्म्चर्ये से विरत रहने का संकल्प हैं यही सम्यक कर्मान्त कहा जाता हैं।
भिक्षुओ सम्यक आजीव क्या हैं ?
भिक्षुओ ! आर्ये श्रावक मिथ्या आजीव को छोड़ सम्यक आजीव से अपनी जीवका चलाता है यही सम्यक आजीव कहा जाता हैं।
भिक्षुओ सम्यक व्ययाम क्या हैं ?
भिक्षुओ ! भिक्षु अनुत्पन्न पापमय अकुशल धर्मो के अनुत्पाद के लिए (जिसमे वे उत्पन न हो सके) इच्छा करता हैं, प्रयास करता हैं, उत्साह करता हैं, मन लगता हैं।
उत्पन पापमय अकुशल धर्मो के प्रहाण के लिए इच्छा करता हैं, प्रयास करता हैं, उत्साह करता हैं, मन लगता हैं।
अनुत्पन्न कुशल धर्मो के उत्पाद के लिए (जिसमे वे उत्पन हो सके) इच्छा करता हैं, प्रयास करता हैं, उत्साह करता हैं, मन लगता हैं।
उत्पन कुशल धर्मो की स्थिति, वृद्धि व् पूर्ण करने के लिए इच्छा करता हैं, प्रयास करता हैं, उत्साह करता हैं, मन लगता हैं। इसी को कहते हैं सम्यक व्ययाम।
भिक्षुओ सम्यक स्मृति क्या हैं ?
भिक्षुओ ! भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता हैं, क्लेशो को तपाते हुये, संप्रज्ञ, स्मृतिमान हो संसार में लोभ और दौर्मनस्ये को दबा कर।
भिक्षु वेदना में वेदनानुपश्यी होकर विहार करता हैं, क्लेशो को तपाते हुये, संप्रज्ञ, स्मृतिमान हो संसार में लोभ और दौर्मनस्ये को दबा कर।
भिक्षु चित में चितनुपश्यी होकर विहार करता हैं, क्लेशो को तपाते हुये, संप्रज्ञ, स्मृतिमान हो संसार में लोभ और दौर्मनस्ये को दबा कर।
भिक्षु धर्मो में धर्मोनुपश्यी होकर विहार करता हैं, क्लेशो को तपाते हुये, संप्रज्ञ, स्मृतिमान हो संसार में लोभ और दौर्मनस्ये को दबा कर।
भिक्षुओ सम्यक समाधी क्या हैं ?
भिक्षुओ ! भिक्षु काम और अकुशल धर्मो से हट, वितर्क और विचार वाले, विवेक से उत्पन प्रीतिसुख वाले प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहार करता हैं।
भिक्षु वितर्क और विचार के शांत हो जाने से, अध्यात्म प्रसाद वाले, चित की एकाग्रता वाले, वितर्क और विचार से रहित, समाधी से उत्पन प्रीति सुख वाले दुितीये ध्यान को प्राप्त हो विहार करता हैं।
भिक्षु प्रीति से विरक्त हो उपेक्षा पूर्वक विहार करता हैं, स्मृतिमान और संप्रज्ञ हो शरीर से सुख का अनुभव करता हैं। जिसे पंडित लोग कहते है स्मृतिमान हो उपेक्षा पूर्वक सुख से विहार करना , इसे तृतीय ध्यान कहते है।
भिक्षु सुख और दुःख के प्रहाण हो जाने से, पहले ही सौमनस्ये और दौर्मनस्ये के अस्त हो जाने से सुख और दुःख से रहित, उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धि वाले चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहार करता है , भिक्षुओ इसी को कहते है सम्यक समाधी।

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