श्रेष्ठ मंगल क्या है?

एक समय भगवान श्रावस्ती नगर के जेतवन उद्यान में श्रेष्टी अनाथपिडिक द्वारा बनवाये संघाराम में विहार कर रहे थे। उस समय भगवान से पूछा गया: –
“बहू देवा मनुस्सा च, मङ्गलानि अचिन्तयुं ।
आकङ्खमाना सोत्थानं, ब्रूहि मङ्गलमुत्तमं ॥”
– कल्याण की कामना करते हुए कितने ही देव और मनुष्य मंगल-धर्मों के संबंध में चिंता-मग्न रहे हैं।
हे तथागत! आप ही कृपा कर बताइए कि वास्तविक श्रेष्ठ मंगल क्या है?
(भगवान) – हे आयुष,
1) “असेवना च बालानं”
– अज्ञानियों से दूर रहना,
2) “पण्डितानञ्च सेवना”
– ज्ञानियों की संगति करना और
3) “पूजा च पूजनेय्यानं”
– जो पूजनीय हैं उनकी पूजा करना
एतं मङ्गलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
4) “पतिरूपदेसवासो च”
– उपयुक्त देश में निवास करना,
5) “पुब्बे च कतपुञ्ञता”
– पूर्व कर्मो का संचित पुण्य होना और
6) “अत्तसम्मापणिधि च”
– स्वयं को सम्यकरूपेन समाहित रखना
एतं मङ्गलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
7) “बाहुसच्चञ्च सिप्पञ्च”
– अनेक विद्याओं और शिल्प-कलाओं में निपुण होना,
😎 “विनयो च सुसिक्खितो”
– विनय स्वभाव में सुशिक्षित होना और
9) “सुभासिता व या वाचा”
– वार्तालाप में सुभाषी होना
एतं मंगलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
10) “माता-पितु उपट्ठानं “
– माता-पिता की सेवा करना,
11) “पुत्तदारस्स सङ्गहो”
– परिवार का पालन-पोषण करना और
12) “अनाकुला च कम्मन्ता”
– आकुल-उद्विग्न न करने वाला निष्पाप
एतं मंगलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
13) “दानञ्च धम्मचरिया च”
– दान देना, धर्माचरण करना,
14) “ञातकानञ्च सङ्गहो”
– सजातीय संबंधियों की सहायता कर संग्रह करना
15) “अनवज्जानि कम्मानि”
– और वर्जित दुष्कर्म न करना
एतं मंगलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
16) “आरती विरती पापा”
– तन-मन से पापों का त्याग करना,
17) “मज्जपाना च संयमो”
– मदिरा सेवन से दूर रहना और
18) “अप्पमादो च धम्मेसु”
– कुशल-धर्मों के पालन में सदा सचेत रहना
एतं मंगलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
19) “गारवो च निवातोच”
– पूजनीय व्यक्तियों को गौरव देना, सदा विनीत रहना,
20) “सन्तुट्ठि च कतञ्ञुता”
– संतुष्ट रहना, कृतज्ञ रहना और
21) “कालेन धम्मस्सवनं”
– उचित समय पर धर्म-श्रवण करना
एतं मंगलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
22) “खन्ती च सोवचस्सता”
– सहनशील होना, आज्ञाकारी होना,
23) “समणानञ्च दस्सनं”
– श्रमणों का दर्शन करना और
24) कालेन धम्मसाकच्छा
– उचित समय पर धर्म-चर्चा करना
एतं मङ्गलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
25) “तपो च ब्रह्मचरियञ्च”
– तप-साधन करना, ब्रह्मचर्य पालन करना
26) “अरियसच्चान दस्सनं”
– चार आर्य-सत्यों का दर्शन करना और
27) निब्बानसच्छिकिरिया च
– निर्वाण का साक्षात्कार करना
एतं मङ्गलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
28-35) “फुट्ठस्स लोकधम्मेहि चित्तं यस्स न कम्पति”
– (लाभ-अलाभ, यश-अपयश, निंदा-प्रशंसा और सुख-दुःख – इन आठ प्रकार के) लोक-धर्मो के स्पर्श से चित्त विचलित नहीं होने देना,
36-38) “असोकं विरजं खेमं “
– निःशोक, निर्मल और निर्भय रहना
एतं मङ्गलमुत्तमं – यह श्रेष्ठ मंगल है।
“एतादिसानि कत्वान, सब्बत्थमपराजिता।
सब्बत्थ सोत्थिं गच्छन्ति, तं तेसं मङ्गलमुत्तमं ॥”
(खुद्दकपाठ ५.१-१३, मङ्गलसुत्त)
जो उपर्युक्त (अड़तीस) मंगल धर्मो का पालन करते हुए सर्वत्र जय-लाभी होते हैं, सर्वत्र कल्याणलाभी होते हैं, उन मंगल-मार्गियों के ये ही श्रेष्ठ मंगल हैं।🙏
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पुस्तक: मंगल जगे गृही जीवन में ।
विपश्यना विशोधन विन्यास ॥
भवतु सब्ब मंङ्गलं !!

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