“बौध्द व्यक्तित्व का विकास।”

एक बार सर्वोत्तम शल्य-चिकित्सक ‘अनाथपिण्डिक’जेतवनाराम पर आए,श्रावस्ती में महान वैज्ञानिक धम्म-राज भगवान बुध्द विहार कर रहें थे।
वहाँ आकर श्रेष्ठ शल्य-चिकित्सक ‘जीवक’ नें भगवन्त को अभिवादन किया और एक ओर आसन ग्रहण कर बैठ गए और सिद्धार्थ गौतम बुध्द से प्रश्न पूछाः
“आदमी को धनार्जन क्यों करना चाहिए?
और यह बताएँ कि गृहस्थ जीवन में कौन-सी बातें स्वागत योग्य,सुखद तथा स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन हैं”
महान शास्त्रज्ञ धम्म-राज गौतम बुध्द ने इस प्रश्न को सुनकर कहाः
इसमें प्रथम विधिपूर्वक धन अर्जित करना हैं।
दूसरी बात यह देखना हैं कि आपके संबंधी भी विधीपूर्वक ही धन सम्पत्ति अर्जित करें।
तीसरी बात दीर्घकाल तक जीवित रहो और लम्बी आयु प्राप्त करो।
गृहस्थ को इन चार चीजों की प्राप्ति करनी हैं जो कि संसार में स्वागत योग्य,सुखकारक तथा स्वीकार्य हैं,परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन हैं,चार अवस्थाएँ भी हैं जो इनसे पूर्ववर्ती हैं।वे हैं,”श्रध्दा, शुध्द आचरण, स्वतंत्रता और बुध्दि”।
शुध्द आचरणः
दूसरे का जीवन लेने अर्थात हत्या करने, चोरी करने,व्यभिचार करने,झुठ बोलने तथा मद्यपान करने से रोकता हैं।
स्वतंत्रता ऐसे ग्रहस्थ का गुण होता हैं।जो धनलोलुपता के दोष से मुक्त,उदार, दानशील, मुक्तहस्त,दान देकर आनंदित होने वाला और इतना शुध्द हृदय का हो कि उसे उपहारों (सामाजिक विकास के दायित्व से प्रेरित) वितरण करने के लिए कहा जा सके।
बुद्धिमान कौन हैं?
वह जो यह जानता हैं कि जिस गृहस्थ के मन में लालच,धन लोलुपता,व्देष,आलस्य, उनींदापन,निद्रालुता,अन्यमनस्कता तथा संशय हैं और जो कार्य करना चाहिए, उसकी उपेक्षा करता हैं,और ऐसा करने वाला प्रसन्नता तथा सम्मान से वंचित रहता हैं।
लालच,कृपणता,व्देष,आलस्य तथा अन्यमनस्कता तथा संशय मन के कलंक है। जो गृहस्त मन के कलंको से छुटकारा पा लेता हैं,वह महान बुध्दि,प्रचुर बुध्दि एवं विवेक,स्पष्ट दृष्टि तथा पूर्ण बुध्दि व विवेक प्राप्त कर लेता हैं।
अतएव,न्यायतःधन कमाना,न्यायपूर्ण ढंग से तथा वैध रुप से धन प्राप्त करना, भारी परिश्रम से कमाना,भुजाओं की शक्ति व बल से धन संचित करना तथा हाथों से पसीना बहाकर परिश्रम से धन प्राप्त करना,एक महान वरदान हैं।ऐसा गृहस्थ स्वयं को प्रसन्न तथा आनंदित महसूस करता हैं और हमेशा प्रसन्नता व हर्ष से परिपूर्ण रहता हैं तथा अपने माता-पिता,पत्नी तथा बच्चों,मालिको और श्रमिकों,मित्रों तथा सहयोगीयों,साथियों को भी प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से परिपूर्ण रखता हैं।
सर्वश्रेष्ठ शल्य-चिकित्सक अनाथपिण्डिक समझ गऐं कि भगवान गौतम बुध्द को बौध्द व्यक्तित्व का विकास पसंद हैं उन्हें निर्धनदुर्बल तथा दरिद्रता ना पसंद थी।
“रिवोल्यूशन एंड काउंटर-रिवोल्यूशन इन एनसिएंट इंडिया।”
खंडः-07 लेखक:
आधुनिक भारत के निर्माते एवं विश्व प्रसिद्ध मानवीय नृवंश शास्त्रज्ञ महान बोधिसत्व बाबासाहब डा.भीमराव अम्बेडकर जी।

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