🌺बुद्ध जयन्ती – वैशाख पूर्णिमा🌺

(यह लेख 28 वर्ष पूर्व पूज्य गुरुजी द्वारा म्यंमा(बर्मा) से भारत आने के पूर्व वर्ष 1968 की वैशाख पूर्णिमा पर लिखा गया था जो वहां की ब्रह्म भारती” नामक मासिक पत्रिका में छपा और ‘आल बर्मा हिंदू सेंट्रल बोर्ड रंगून द्वारा पुनः पत्रक के रूप में छपवाकर वितरित किया गया था। आज की वैशाख पूर्णिमा पर साधकों के लाभार्थ पुनः प्रकाशित। सं.)

आज वैशाख पूर्णिमा है। 2592 वर्ष पूर्व इसी दिन आधुनिक नेपाल के लुंबिनी वन-प्रदेश में राजकुमार सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ था । 35 वर्ष अनंतर इसी वैशाख पूर्णिमा के दिन विरक्त राजकुमार ने गया-प्रदेश में बोधिवृक्ष के नीचे सम्यक संबोधि प्राप्त की थी।
___ क्या थी वह सम्यक संबोधि, जिसे प्राप्त कर राजकुमार सिद्धार्थ भगवान बुद्ध बना? कैसा था वह बुद्ध-ज्ञान, जिसने मानवी अध्यात्म-दर्शन को नयी ऊंचाइयां प्रदान की?
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बोधि प्राप्त करते हुए भगवान ने देखा – यह अविद्या है, “मैं” और “मेरे” का मिथ्या आत्मवादी अहंभाव है – यही अज्ञान है। इसी के कारण संस्कार बनते हैं और जहां संस्कार हैं, वहां चैतन्य है। यह चैतन्य ही है जिसके कारण चित्त और काया के संयोग द्वारा जीवन की एक अजम्न धारा प्रवाहित होती है। जहां काया और चित्त का संयोग है, वहां आंख, कान, नाक ,जीभ, त्वचा और मन – ये छह इंद्रियां हैं और इन इंद्रियों के छह विषय हैं – रूप, शब्द, गंध, रस, स्प्रष्टव्य और मनोविकार । जैसे ही इन इंद्रियों का अपने विषयों से स्पर्श होता है, वैसे ही अनुभूति होती है। इसी अनुभूति के कारण विषयों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। यही तृष्णा है। (द्वेष इसी सिक्के का दूसरा पहलू है।) यह तृष्णा ही बढ़ कर तीव्र लालसा का रूप धारण कर लेती है और इस लालसा की पूर्ति के लिए ही भिन्न-भिन्न मानसिक, कायिक और वाचिक कर्म होते हैं, जो स्वानुकूल कर्म-भव के कारण बनते हैं। इसी कर्म-भव से जन्म होता है। और जन्म होता है तो जरा, व्याधि और मृत्यु अवश्यंभावी है। इस प्रकार अविद्या और तृष्णा के कारण दु:खों का अपार समूह उठ खड़ा होता है।
तो भगवान ने देखा – यह दुःख है और इस दुःख के उत्पन्न होने काकारण है। परंतु निराशा की कोई बात नहीं। इस दुःख का निरोध भी है। निरोध का एक उपाय है, एक मार्ग है। यही है आर्य अष्टांगिक मार्ग! कैसा है यह आर्य अष्टांगिक मार्ग?
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इस आठ अंग वाले मार्ग को हम तीन खंडो में विभक्त कर सकते हैं। पहला शील-खंड है। इसके अंतर्गत सम्मावाचा, सम्माकम्मन्तो और सम्माआजीवो आते हैं। शील का अर्थ हुआ – सदाचारमय जीवन । काया और वाणी से किसी प्रकार का भी दुराचरण न करना ही शील है। दूसरा समाधि-खंड है। इसके अंतर्गत सम्मावायामो, सम्मासति और सम्मासमाधि आते हैं। याने सतत अभ्यास द्वारा चंचल चित्त को किसी एक आलंबन पर केंद्रित कर स्थिर-शांत कर देना; एकाग्र-चित्त हो जाना ही समाधि है। तीसरा प्रज्ञा-खंड है। इसके अंतर्गत सम्मासङ्कप्पो और सम्मादिट्ठि आते हैं। यह ज्ञान-खंड है। शुभ संकल्प द्वारा विपश्यना साधना के अभ्यास से प्रज्ञा जाग्रत होती है, अंतर्चक्षु खुलते हैं। साधक सचेत रह कर अध्यात्म-साक्षात्कार करता है। सत्य का सूक्ष्म निरीक्षण विश्लेषण करता है। काया और चित्त का निरीक्षण-विश्लेषण, आंतरिक अनुभूतियों का और प्रकृति के सत्य स्वभाव का निरीक्षण-विश्लेषण करता है। इसी विपश्यना द्वारा स्वतः स्पष्ट अनुभव होने लगता है कि इंद्रिय जगत के सारे विषय प्रतिक्षण परिवर्तनशील हैं, अतः अनित्य हैं और ऊपर से सुखदायी प्रतीत होते हुए भी स्वभाव से दु:खमय हैं । वे निस्सार हैं । ‘मैं’ और ‘मेरा’ कहलाने लायक नहीं हैं। अत: अनात्म हैं। इस प्रकार इसी साढ़े तीन हाथ की काया के भीतर इंद्रिय जगत की अनुभूतियों का दिग्दर्शन करते हुए चित्त वितृष्ण
और अनासक्त होता है, अविद्या की कड़ियां टूटती हैं और परिणामतः इंद्रियातीत अवस्था प्राप्त होती है। यही निर्वाण है, जो नित्य है, शाश्वत है और परम सुख है। इसका साक्षात्कार ही दुःख-निरोध है, साधना की सिद्धि है। यही मार्ग है। यही मार्ग का फल है।
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स्पष्ट है कि सतृष्ण चित्त ही दु:ख का जनक है और वितृष्ण चित्त ही दुःख-निरोध है। अत: दुःख-मुक्त होना है तो चित्त को वितृष्ण कर निर्मल बनाना ही होगा क्योंकि मन ही प्रधान है। मन ही प्रमुख है। दुःख-प्रजनन और दुःख-भंजन के मूल में मन की ही विशिष्ट महत्ता है । जब दुःखरूपी रोग का निदान हो गया तो रोग के बाहरी उपचारों को महत्त्व देना व्यर्थ है। सीधे रोग की जड़ पर ही प्रहार करना होगा। मन को पकड़ना होगा, उसे ही बदलना होगा, उसे ही सुधारना होगा। यह काम बाहरी कर्मकांडों से कदापि न हो सकेगा। न ही किसी देव-ब्रह्मा की कृपादृष्टि से अथवा वरदान-प्रसाद से हो सकेगा। इसके लिए तो स्वयं सतत अभ्यास करना होगा। ऐसी विधि अपनानी होगी जो सीधे मन से संबंध रखती हो। और यही विपश्यना विधि है। यही धर्म-सिद्धांत का व्यावहारिक पक्ष है। अत: भगवान ने इसी पर अधिक बल दिया। यह व्यावहारिक पक्ष ही है जो कि सद्धर्म को सांदृष्टिक’ याने स्वयं प्रत्यक्ष देखने योग्य बनाता है। यही इसे ‘अकालिक याने तत्काल फलदायी बनाता है। साधक स्वयं यहीं, इसी जन्म में, इसी काया के भीतर विमुक्ति-रस का आस्वादन करता है – अपने ही सत्प्रयत्नों द्वारा, किसी बाह्य शक्ति के भरोसे नहीं।
हमारे उत्थान और पतन के कारण हम स्वयं हैं, बंधन और मोक्ष के कारण हम स्वयं हैं। इस समय हम जो कुछ हैं, अपने ही कर्मों के परिणाम-पुंज हैं। भविष्य में जो कुछ बनेंगे, अपने ही कारण बनेंगे। वर्तमान कर्मों पर और भावी गति पर हमारा अपना अधिकार है। हमने स्वयं जो उलझन पैदा की है, उसे हमें ही सुलझाना होगा। यह काम किसी बाह्य शक्ति के भरोसे होने वाला नहीं है।
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पैंतीस वर्ष की अवस्था में सम्यक संबोधि प्राप्त कर आगामी पैंतालीस वर्ष तक भगवान इसी ‘सांदृष्टिक’ और ‘अकालिक धर्म की शिक्षा में निरत रहे । लाखों करोड़ों मानवों की मिथ्या-दृष्टियां दूर की, थोथी रूढ़ियों और परंपराओं की पोल खोली, निस्सार मान्यताओं का उच्छेदन किया और मानव के भीतर समाये हुए उस असीम सामर्थ्य को जाग्रत किया, जिससे कि वह अपने पांव पर स्वयं खड़ा हो सके और नासमझी में लगायी हुई बैसाखियां तोड़ कर फेंक सके । तीर्थ-स्नान, व्रत-उपवास, वेश-भूषा, पूजा-पाठ, प्रार्थना-प्रशंसा, अनुनय-विनय आदि बाह्य कर्मकांडोंको ही मुक्ति का साधन मान बैठने वाले बहिर्मुखी मानव को उन्होंने अंतर्मुखी बनाया। चित्त को विरज-विमल बना कर सीधे सही रास्ते पर चल सकने वाला ऐसा सहज-सरल तरीका बतलाया, जिससे कि मनुष्य अपना अनुशासन स्वयं कर सके ,अपना मुक्तिदाता स्वयं बन सके । इस प्रकार किसी भी बाह्य शक्ति पर आश्रित न रह कर मानव को स्वयं अपनी महानता के पथ पर अग्रसर हो सकने का संबल प्रदान किया, आत्म-निर्भरता और आत्म-विश्वास प्रदान किया, आत्मशरण और धर्मशरण की अनन्यता प्रदान की।

__मानव जगत को यही अमूल्य विरासत प्रदान करते हुए जीवन के 80 वर्ष पूरे क र 2540 वर्ष पूर्व आज ही के दिन भगवान बुद्ध परिनिवृत्त हुए। अतः वैशाख पूर्णिमा का यह पावन दिवस त्रिधा धन्य हुआ।
मंगल मित्र
स. ना. गो.

मई 1996 हिंदी पत्रिका में प्रकाशित

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